शरमाया सा कुछ सकुचाया सा,
ताज़ा सा कसकसाया सा,वो देख रहा था बाहर कोई उसे लेने आया था,
शायद आज उसका जीवन सार्थक होने वाला था,
चमक सा गया वो जब ये सच हुआ
नए घर में उसे लाया गया, उसका स्वागत, पूजा हुई
सब बहुत खुश थे उसे देख के, उससे मिल के
उसे तिलक लगाया, सजाया, संवारा,
खूब ध्यान रखेंगे ऐसा समझाया
वो दिन बहुत खास था
उसे वो दिखी, जो उसकी साथी थी,
ढोल पथक कहते हैं उन्हें,
उसे ये बात ज्ञात हुई
लाई थी दुपट्टा की उसकी रस्सी ना चुभे,
बाँध ले उसे सही से की भारी ना लगे,
वो भी खुश था, कि आज तो वो बंधेगा एक डोर से,
रोज बजेगा दिल खोल के,
Beats निकालेगा, साथ में नाचेगा,
खुश होगा और समाँ बाँधेगा
रोज सब मिलते थे, हँसते गाते ढोल बजाते थे,
बहुत खुश होता था, after all और भी उसके संगी साथी जो अब साथ थे
जल्लोष बोले जाएंगे वो, ऐसा सबने सोचा और माना
उसे गर्व हुआ इस नयी पहचान से,
पहले कुछ दिन कठिन थे, क्या करना है कैसे करना है,
कोई समझ ही नहीं पाता था,
निरंतर अभ्यास से सब धीरे-धीरे परिपक्व हुए ,
आ रहें हैं गणपति, सोच के सब खुश हुए
जोर शोर से हो रही थी तैयारी,
सज रही थी सोसाइटी, बन रहे थे plan
आगमन में क्या होगा कैसे होगा,
ये भी इधर खूब खुश था, रोज मिलना जो होता था अपनी साथी से
सब लगे थे पूरे उत्साह से, और थे उत्सव के इंतज़ार में
वो दिन भी आ गया,
वो भी सजी, उसे भी सजाया,
जोश और मस्ती में सबने ढोल बजाया,
सब नाचे गाए
और स्वागत किया बाप्पा का ऐसा
जैसा की कोई और सोच ना पाए
होते रहे समारोह, बीत गए सात दिन,
हर्षोल्लास, भक्ति भाव, नृत्य संगीत रहा हर दिन
वह भी खुश था, सब का साथ था,
आ रहा था विसर्जन का दिन, उसका भी उसे एहसास था,
दिन बीते शाम हुई,
जा रहे गणपति, सोच के आँखें नम हुईं
फिर उठा जल्लोष, फ़िर ढोल बजाया,
वो भी गूंजा जोश से अपनी साथी के साथ,
और आखिरी बार वो नाचा गाया,
रखा गया उसे सम्भाल के,
जाते जाते बोल गई वो,
फ़िर मिलेंगे जल्दी ही,
यूँ उदास ना हो,
फ़िर गूंजेगा निनाद,
शंख, ताशे और ढोल का,
फ़िर पधारेंगे गणपति,
फ़िर होगा जल्लोष !!!